The pen is mightier than the sword. — Edward Bulwer-Lytton

"सब कुछ पैसा नहीं होता" से लेकर "बराबरी" तक: दुनिया के दोहरे मापदंड और कड़वी हकीकत

हम सबने अपनी जिंदगी में कभी न कभी यह बात ज़रूर सुनी होगी कि इंसान का दिल अच्छा होना चाहिए, बाकी सब तो आनी-जानी चीज़ है। सुनने में यह बात जितनी खूबसूरत और तसल्ली देने वाली लगती है, असल जिंदगी में यह उतनी ही खोखली साबित होती है। थोड़ा गहराई से अपने आस-पास के माहौल को देखें, तो समझ आता है कि यह दुनिया किसी ऊंचे आदर्श से नहीं, बल्कि सिर्फ अपनी ज़रूरत और स्वार्थ से चलती है। हमारे समाज का सच यही है कि हमारे हाथी के दांत खाने के कुछ और हैं और दिखाने के कुछ और।

आजकल एक नया चलन शुरू हुआ है जिसे लोग बड़ी शान से ‘स्ट्रेट फॉरवर्ड’ या ‘मुंहफट’ होना कहते हैं। लोग किसी को भी, कहीं भी, कुछ भी चुभने वाली बात बोल देते हैं और बाद में बड़ी आसानी से कह देते हैं कि मैं तो साफ बोलने वाला इंसान हूं, पीठ पीछे नहीं बोलता। लेकिन कभी रुक कर यह सोचना ज़रूरी नहीं समझा जाता कि क्या सच बोलने का मतलब बदतमीजी होता है? किसी के रंग-रूप, उसकी मजबूरी या उसकी आर्थिक कमजोरी पर कुछ ऐसा कह देना कि सामने वाला रात भर सो न पाए, अंदर तक टूट जाए, यह कोई ईमानदारी नहीं है। यह सीधे-सीधे किसी के जज्बात का कत्ल है। सच बोलना बहुत ज़रूरी है, लेकिन उसमें लिहाज और नरमी होना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है। बात तो एक झटके में बोलकर लोग निकल जाते हैं, पर उस तीखे शब्द का घाव सामने वाले को महीनों तक झेलना पड़ता है।

यही दोहरापन तब और साफ़ दिखता है जब लोग कहते हैं कि इंसान अच्छा होना चाहिए। लेकिन जैसे ही कोई बड़ा फैसला लेना हो, कोई रिश्ता जोड़ना हो या समाज में किसी को बराबर का दर्जा देना हो, ये सारे आदर्श हवा हो जाते हैं। तब दबी ज़बान से शर्तें शुरू होती हैं कि इंसान तो अच्छा है पर थोड़ा पढ़ा-लिखा होना चाहिए ताकि चार लोगों में उठने-बैठने लायक रहे। शक्ल-सूरत में थोड़ी बराबरी होनी चाहिए और बैंक बैलेंस भी तो देखना पड़ता है।

यहाँ ठहरकर सोचना होगा कि क्या एक अच्छा इंसान होने के लिए किसी डिग्री, दौलत या शक्ल की गारंटी होना ज़रूरी है? रूप-रंग तो ऊपर वाले की देन है, इसमें हमारा कोई योगदान नहीं। दौलत आज है और कल चली जाएगी। रही बात पढ़ाई की, तो एक डिग्री आपको अच्छी नौकरी या व्यापार दिला सकती है, पर किसी को इज़्ज़त देना और तमीज़ से बात करना नहीं सिखा सकती। एक अनपढ़ और गरीब इंसान का दिल भी इतना बड़ा हो सकता है जो अपनी आखिरी रोटी किसी और को दे दे, और लाखों कमाने वाला एक उच्च शिक्षित व्यक्ति भी हद दर्जे का स्वार्थी हो सकता है। पर अफ़सोस, आज का समाज इंसान की कीमत उसके चरित्र से नहीं, उसकी जेब से लगाता है।

जब हम इस दिखावे की दुनिया के सामने झुकने से मना कर देते हैं और अपने सिद्धांतों को बचाना चाहते हैं, तब हमें समाज में ‘अड़ियल’ या ‘अजीब’ मान लिया जाता है। लोग चाहते हैं कि हम उनकी शर्तों के हिसाब से खुद को ढाल लें। हर मोड़ पर समझौता करना, जैसे इस दुनिया का अलिखित नियम बन चुका है। इसी कशमकश और इंसान की खुद्दारी को मशहूर शायर जव्वाद शेख साहब ने अपने एक शेर में बेहद संजीदगी से बयां किया है:

“आप जैसों के लिए इसमे रखा कुछ भी नहीं

मगर ऐसा तो कहिए क वफा कुछ भी नहीं

मै किसी तरह भी समझौता नहीं कर सकता

या तो सब कुछ ही मुझे चाहिए या कुछ भी नहीं”

यह शेर इस बात का सबसे बड़ा गवाह है कि जो इंसान अपने अंदर एक सच्चा और साफ़ दिल रखता है, वह रिश्तों में और अपनी इंसानियत में आधा-अधूरा समझौता कभी नहीं कर सकता। मतलबी लोग भले ही यह कहें कि दुनिया ऐसे ही चलती है, थोड़ा समझौता कर लो, लेकिन एक खुद्दार इंसान या तो रिश्तों में पूरी ईमानदारी चाहता है, या फिर उसे ऐसी खोखली महफ़िल से कुछ भी नहीं चाहिए।

यही कारण है कि जब हम बड़े-बड़े नेताओं, अफ़सरों या विचारकों को मंच से बड़ी-बड़ी बातें करते सुनते हैं, तो वो बातें सिर्फ मंच तक ही अच्छी लगती हैं। जब उनके हाथ में माइक होता है, तो उनके पास दुनिया की हर समस्या का समाधान होता है। वे घंटों इंसानियत और बराबरी पर भाषण दे सकते हैं। लेकिन इस समाज का सबसे बड़ा दुख यही है कि उन बातों को अपनी निजी जिंदगी में लागू करना उतना ही मुश्किल होता है जितना आसमान का ज़मीन से मिलना। ओहदा और शोहरत आपको ज्ञान देने की ताकत तो दे देते हैं, लेकिन आपका असली किरदार तब दिखता है जब आप अकेले में, बिना किसी कैमरे के, किसी आम इंसान या किसी मजबूर से बर्ताव करते हैं। अगर आपका व्यवहार आपके विचारों से मेल नहीं खाता, तो आपकी वह शोहरत सिर्फ एक ढोंग है।

इस मतलबी और दोहरे मापदंडों वाली दुनिया में जीते हुए कई बार हमारे साथ ऐसे हादसे या धोखे होते हैं जो हमें भीतर तक झकझोर देते हैं। जब समाज की यह असलियत सामने आती है, तो मन मायूसी से भर जाता है। लेकिन जिंदगी को जीने का एक और बहुत खूबसूरत और मजबूत नजरिया है, जिसे मैंने अपनी जिंदगी का मूल मंत्र बनाया है।

मेरा हमेशा से यह मानना रहा है कि जिंदगी के हर कदम को सिर्फ एक तजुर्बा माना जाए। जब आप अपने साथ हुए बुरे हादसों को कोई गहरी चोट या दुख मानने के बजाय एक ‘तजुर्बा’ समझ लेते हैं, तो फिर उन्हें याद करके आपको दोबारा कभी परेशानी या तकलीफ नहीं होती। यह बात मन को बहुत शांत करती है। जब हम किसी कड़वे अनुभव को एक व्यक्तिगत हार मानने के बजाय आने वाले कल की सीख मान लेते हैं, तो हमारा दिमाग उस पुराने दर्द के पिंजरे से हमेशा के लिए आज़ाद हो जाता है। फिर वह हादसा हमें कमज़ोर नहीं करता, बल्कि आने वाली जिंदगी के लिए और ज्यादा मजबूत तथा समझदार बना देता है। जिंदगी के जख्मों को भी स्याही बनाकर कागज़ पर एक अनमोल सबक लिख देना ही एक रचनाकार की सबसे बड़ी सार्थकता है।

यह दुनिया मतलबी है और अपनी ज़रूरत के हिसाब से ही चलेगी, इस हकीकत को स्वीकार करना ही होगा। लोग आपका पद, आपका बैंक बैलेंस और आपकी बाहरी खूबसूरती देख कर ही आपसे रिश्ते की गहराई तय करेंगे। लेकिन इस चकाचौंध और झूठ से भरी दुनिया में हमारा सबसे बड़ा इम्तिहान यही है कि हम खुद को न खोएं।

जैसा कि जव्वाद शेख साहब के शेर से हमें सीख मिलती है-हमें अपनी वफादारी पर कभी कोई आधा-अधूरा समझौता नहीं करना है। और रास्ते में मिलने वाले हर धोखे या हादसे को एक तजुर्बा मानकर मुस्कुराते हुए आगे बढ़ जाना है।

असली शोहरत वही है जो किसी के दिल में आपके अच्छे बर्ताव की वजह से पैदा हो, न कि आपके ऊंचे पद या बैंक बैलेंस की वजह से। वक्त बदल जाएगा, लोग बदल जाएंगे, चेहरे से मुखौटे उतर जाएंगे, पर आपका सच्चा और अडिग किरदार हमेशा जिंदा रहेगा।

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